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June 02, 2007
Netaji's Speech on Bahadur Shah Zafar

As India celebrates the 150th Anniversary of the 1st War of Independence (1857), we refer to Aflatoon’s presentation of Netaji Subhash Chandra Bose’s speech on 11th July 1944 to the Azad Hind Fauj and his reference to this First War of Independence. It is especially poignant to listen to Netaji’s reference to Bahadur Shah Zafar.

The complete speech is presented in Hindi below (or on a blog by Aflatoon).

 

Netaji, at the outset, points out that this war of independence was not a spontaneous reaction as English historians have presented. It is an impossible coincident that communities from around the country (often separated by vast geographies) spontaneously rebelled against the British – significant planning was necessary and much communication. An example of such planning included the travels of Nana Saheb to various parts of Europe to build European allies for such an effort – unfortunately, none was forthcoming.

 

The victories in the first round were huge – every rebellion put out the local British forces. However, there was not enough planning done to deal with arrival of British reinforcements and the war was lost. However, Netaji points out, history has shown it unlikely that the first operation turns successful. He then urges the soldiers of the Azad Hind Fauj to learn from those losses.

 

It is also worthwhile to reflect on his comments on Bahadur Shah Zafar and his role in this War –theories abound about the role of this monarch of a fading dynasty. Netaji points to ‘Samrat’ Bahadur Shah Zafar as an inspirational model. The monarch organized a committee of six including three warrior / politicians and three civic society leaders to help coordinate this effort. He quotes from a letter that the monarch wrote in his own hand and dispatched to numerous kings including those of Jaipur, Bikaner, Jodhpur, Alvar, etc saying:

“It is my strong desire that by any means and at any cost, the English be removed from India. It is my keen desire that the whole of India be free. This  revolutionary war cannot be won till that point when we do not have such a person leading this effort who can feel responsibility for all communities, all people in this land, and who can bring together the powers from all over the land and who can raise awareness among people from all over this land. I do not have any wish to rule India once the English have been removed. I urge you to arm yourself for this cause and I promise to withdraw my claims for ruling India so that a federation of kings may rule India.”

 

Netaji points out that while Bahadur Shah Zafar was old and weak – and he recognized that – he was visionary. He recognized the need for a leader who was inclusive. And he had no interest in clinging to power. While Netaji does not explicitly say this, it is also notable that many of these letters were to Hindu kings.

 

In another declaration that is found in Bareli, Netaji says, Bahadur Shah Zafar addresses all his citizens:

“In this army, I urge equality, that everyone forget the differences between castes, between big and small since in this noble war, everyone who fights will fight for ones rights and will be glorious. Everyone in this effort is a brother – irrespective of difference in cast and class. Hence I urge all my Hindustani brothers to awake and to heed this divine calling to take on this supreme responsibility and fight.”

Netaji ends his speech with a couplet form Bahadur Shah Zafar after the war had been lost by the Indians and points out that the foundation for the war on which the soldiers of the Azad Hind Fauj were embarking was actually laid by the brave men and women from 1857 and that old monarch.

 

1857 में हुई आज़ादी की पहली लड़ाई की 150वीं वर्षगाँठ इस वर्ष देश भर में मनाई जा रही है। इस मौके पर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेताजी द्वारा प्रथम संग्राम के देशभक्त नायक की स्मृति में दिए गए इस दुर्लभ भाषण को नेताजी के दिल के करीब की ज़ुबाँ में पेश करते हुए हमें खुशी हो रही है। "राष्ट्रभाषा के नाते काँग्रेस ने हिन्दी (या हिन्दुस्तानी) को अपनाया, इससे अंग्रेजी का महत्व समाप्त हुआ" - इस उपलब्धि का श्रेय नेताजी महात्मा गाँधी को देते हैं। यह भाषण नेताजी ने सम्राट-कवि बहादुरशाह ज़फ़र की मज़ार पर हुए आज़ाद हिन्द फौज की आनुष्ठनिक कवायद और जलसे में 11 जुलाई, 1944 को दिया था। नेताजी की 'ब्लड बाथ' नामक पुस्तिका में यह संकलित है। यह पुस्तिका पहले-पहल 'आज़ाद हिन्द सरकार' के 'प्रेस, प्रकाशन तथा प्रचार विभाग' द्वारा बर्मा से प्रकाशित हुई थी तथा नेताजी जन्मशती के मौके पर, 1996 में, जयश्री प्रकाशन ( 20 ए प्रिंस गुलाम मोहम्मद रोड, कोलकाता - 700026) द्वारा पुनर्प्रकाशित की गई है। हिन्दी अनुवाद : अफ़लातून।

 

पिछले साल सितम्बर महीने में हमने भारत की आज़ादी की पहली जंग और इंकलाब के रहनुमा सम्राट बहादुरशाह की मज़ार पर आनुष्ठनिक कवायद का आयोजन किया था। पिछले साल हुआ जलसा भारत की आज़ादी के लिए हो रहे संघर्ष के लिहाज से ऐतिहासिक था चूँकि आज़ाद हिन्द फौज की टुकड़ियाँ मौजूद थीं और जलसे में उन्होंने शिरकत भी की थी। मैं उस जलसे को ऐतिहासिक क़रार दे रहा हूँ चूँकि वह पहला मौका था जब हिन्द की नई इन्कलाबी फौज द्वारा भारत की पहली इंकलाबी फौज के सेनापति को श्रद्धांजलि दी गई। पिछले साल की कवायद में हम में से जो लोग भी शरीक थे उन लोगों ने सम्राट बहादुरशाह के काम को आगे बढ़ाने और भारत को ब्रिटिश गुलामी के जुए से निजात दिलाने की क़सम ली थी। मुझे इस बात की खुशी और फक्र है कि उस कसम को आंशिक तौर पर पूरा करने में हमें कामयाबी मिली है। पिछले साल के जलसे में मौजूद ज्यादातर सैनिक इस वक्त अग्रिम मोर्चा संभाले हुए हैं। भारत की सरहद को पार कर आज़ाद हिन्द फौज आज मातृभूमि की मिट्टी पर लड़ रही है।

इस साल के आयोजन के साथ यह असाधारण, शायद दैविय संयोग था कि सम्राट बहादुरशाह की पुण्य तिथि और 'नेताजी सप्ताह' एक साथ पड़े हैं। 'नेताजी सप्ताह' के दौरान समूचे पूर्वी एशिया में रहने वाले भारतीय भारतीयों ने मुकम्मिल आज़ादी हासिल करने तक अपनी लड़ाई जारी रखने का विधिवत संकल्प लिया है। यह दैविय संकेत है कि आज़ादी के जंग के पहले सेनापति की समाधि का स्थल भारत की आज़ादी की आखिरी जंग का मुख्य केन्द्र है। इसी पवित्र अड्डे से हमारी अपनी मातृभूमि की ओर अग्रसर है। आज़ाद हिन्द फौज की आनुष्ठनिक कवायद में इसी स्थान पर पुन: जुट कर हम अपने संकल्प की आंशिक पूर्ति की खुशी महसूस करने के साथ-साथ भारत की भूमि को अनचाहे अंग्रेजों से निजात दिलाने तक अनवरत संघर्ष के लिए कमर-कस कर तैयार हो रहे हैं।

यहाँ 1857 के घटनाक्रम पर एक नज़र डालना वाजिब होगा। अंग्रेज इतिहासकारों ने 1857 की लड़ाई के बारे में यह दुष्प्रचार कर रखा है कि वह अंग्रेज फौज में सेवारत भारतीय सैनिकों का विद्रोह-मात्र था। हकीकत है कि वह एक कौमी इन्कलाब था जिसमें भारतीय सैनिकों के साथ-साथ नागरिकों ने भी शिरकत की थी। इस राष्ट्रव्यापी जंग में कई राजा शरीक हुए जबकि यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि कई राजा खुद को दरकिनार किए रहे। इस जंग के शुरुआती दौर में कई फतह हुईं, अन्तिम दौर में ही बड़ी ताकत के बल पर हमें पराजित किया गया। किसी क्रान्ति की तवारीख़ में ऐसा होना बिलकुल असामान्य नहीं है। दुनिया के इतिहास में यह मुश्किल से मिलेगा जब क्रान्ति पहले संघर्ष में ही कामयाब हो गयी हो। "आज़ादी की लड़ाई एक बार आरम्भ होती है तो पुश्त-दर-पुश्त चलती है"। बवक्तन यदि इंकलाब नाकामयाब भी होता है या दबा दिया जाता है तब भी उसके कुछ सबक हासिल होते हैं। आगे आने वाली पीढ़ियाँ इन सबक को लेकर अपनी लड़ाई ज्यादा असरकारक तरीके से, ज्यादा तैयारी के साथ फिर से खड़ी करती हैं। हम ने 1857 की नाकामयाबी से सबक लिया है और इस तजुर्बे का इस्तेमाल भारत की आज़ादी की इस आखिरी जंग में किया है।

यह सोचना भूल होगी कि 1857 में एक दिन अचानक लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ़ हथियार उठा लिए। कोई भी क्रान्ति जल्दबाजी में या अललटप्पू तरीके से नहीं लायी जाती है। 1857 के हमारे रहनुमाओं ने अपने तईं पूरी तैयारी की थी, लेकिन अफ़सोस कि वह पर्याप्त नहीं थी। उस पवित्र युद्ध के एक प्रमुख नेता नाना साहब ने मदद और सहयोग हासिल करने के मक़सद से युरोप तक की यात्रा की थी। दुर्भाग्यवश उन्हें इस कोशिश में कामयाबी हासिल नहीं हुई और नतीजतन 1857 में जब क्रान्ति शुरु हुई, तब अंग्रेजों का बाकी दुनिया से कोई झगड़ा नहीं था और वे अपनी पूरी ताकत और संसाधन हिन्द के लोगों को कुचलने में लगा सके। मुल्क की भीतर जनता और भारतीय सैनिकों के बीच काबिले गौर होशियारी के साथ गुप्त सन्देश प्रचारित कर दिये गये थे। इस वजह से संकेत होते ही देश के कई हिस्सों में एक साथ लड़ाई शुरु हो सकी। फ़तह पर फ़तह हासिल होती गयी। उत्तर भारत के महत्वपूर्ण शहर अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त हो गये तथा उनमें इन्कलाबी फौज ने जीत का परचम लहराया। अभियान के पहले चरण में हर जगह इन्कलाब को कामयाबी मिली। दूसरे चरण में जब दुश्मन का जवाबी हमला शुरु हुआ तब हमारे सैनिक टिक न सके। तब ही यह पता चला कि क्रान्तिकारियों ने एक राष्ट्रव्यापी रणनीति नहीं बनाई थी तथा उस रणनीति के संचालन और समन्वय के लिए एक गतिमान नेता का अभाव था। देश के कई भागों के राजा निष्क्रीय और उदासीन रहे। बहादुरशाह ने इस बाबत जयपुर, जोधपुर, बिकानेर, अलवर आदि के राजाओं को लिखा :

"मेरी प्रबल आरज़ू है कि अंग्रेज किसी भी कीमत पर, किन्हीं भी उपायों से हिन्दुस्तान से खदेड़ दिए जायें। मेरी उत्कट कामना है कि समूचा हिन्दुस्तान आज़ाद हो। इस उद्देश्य से छेड़ा गए इन्कलाबी युद्ध के माथे पर विजय का सेहरा तब तक बँध नहीं सकता जब तक ऐसा कोई व्यक्ति सामने नहीं आता जो पूरी तहरीक की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर ले सके, राष्ट्र की विभिन्न शक्तियों को संगठित कर सके तथा पूरी जनता को इस जागृति के दौरान राह दिखाये। अंग्रेजों को हटाने के बाद भारत पर राज करने की मेरी कोई तमन्ना नहीं है। आप सभी अपनी म्यानों से तलवार खींच कर दुश्मन को भगाने के लिए तैयार हो जायें तब मैं तमाम शाही-हकूक भारतीय राजाओं के संघ के हक़ में छोड़ने के लिए तैयार हूँ।"

यह ख़त बहादुरशाह ने अपने हाथ से लिखा था। देशभक्ति और त्याग की भावना से सराबोर इस पत्र को पढ़कर हर आज़ादी-पसन्द हिन्दुस्तानी का सिर प्रशंसा और अदब से झुक जाएगा।

बहादुरशाह बूढ़े और कमजोर हो चुके थे और इसलिए उन्हें लगा कि खुद इस जंग का संचालन करना उनके बूते के बाहर होगा। उन्होंने छ: सदस्यीय समिति गठित की जिसमें तीन सेनापति और तीन नागरिक-प्रतिनिधि थे। इस समिति को पूरे अभियान को संचालित करने की जिम्मेदारी दी गई। उनके द्वारा किए गए तमाम प्रयास निष्फल रहे क्योंकि भारत की पूर्ण आजादी के लिए परिस्थितियाँ परिपक्व नहीं हुई थीं।

एक और तथ्य इस बुजुर्ग नेता के इन्कलाबी जज़्बे और जोश का द्योतक है। उत्तर प्रदेश के बरेली शहर की दीवारों पर अंकित बहादुरशाह का यह फ़रमान गौरतलब है :

"हमारी इस फौज में छोटे-बड़े का भेद भूलकर बराबरी के आधार को नियम माना जाएगा चूँकि इस पाक जंग में तलवार चलाने वाला हर शक्स समान रूप से प्रतापी है। इसमें शामिल सभी लोग भाई-भाई हैं, उनमें अलग-अलग वर्ग नहीं होंगे। इसलिए मैं अपने सभी हिन्दुस्तानी भाइयों से आह्वान कर रहा हूँ जागो तथा दैवी आदेश और सर्वोच्च दायित्व का निर्वाह करने के लिए रण भूमि में कूद पड़ो। "

मैंने इन तथ्यों का हवाला इसलिए दिया है ताकि आप यह जान सकें कि मौजूदा आज़ाद हिन्द फौज की बुनियाद 1857 में पड़ चुकी थी। आज़ादी की इस आखिरी जंग में हमें 1857 की जंग और उसकी खामियों से सबक लेना होगा।

इस बार दैव-योग हमारे पक्ष में है। शत्रु कई मोर्चों पर जीवन-मृत्यु के संघर्ष में उलझा हुआ है। देश की जनता पूरी तरह जागृत है। आज़ाद हिन्द फौज एक अपराजेय शक्ति है और उसके सभी सदस्य अपने राष्ट्र की मुक्ति के साझा प्रयत्न के लिए एकताबद्ध हैं। पूर्ण विजय हासिल करने तक चलने वाले इस अभियान के लिए हम एक दूरगामी साझा रणनीति से लैस हैं। हमारा आधार-अड्डा अच्छी तरह संगठित है और सबसे महत्वपूर्ण है कि अपना जौहर दिखाने की प्रेरणा के लिए हमारे पास बहादुरशाह की यादें और मिसाल है। अंतिम विजय हमारी होगी इसमें क्या कोई शक रह जाता है?

जब मैं 1857 के घटनाक्रम का अध्ययन करता हूँ और क्रान्ति के विफल हो जाने के बाद अंग्रेजों द्वारा ढाये गए जुल्म और सितम को याद करता हूँ तब मेरा खून खौल उठता है। अगर हम मर्द हैं, तब 1857 और उसके बाद के वीरों पर अंग्रेजों द्वारा ढाये गए जुल्म और बर्बरता का पूरा बदला ले कर रहेंगे। अंग्रेजों ने निर्दोष व आज़ादी पसन्द हिन्दुस्तानियों का खून न सिर्फ युद्ध के दौरान बहाया बल्कि उसके बाद भी अमानवीय अत्याचार किए। उन्हें इन अपराधों की कीमत चुकानी होगी। हम भारतीय, शत्रु से पर्याप्त घृणा नहीं करते। यदि आप चाहते हैं कि आपके देशवासी अतिमानवीय साहस और शौर्य की ऊँचाइयों को छू सकें तब आपको उन्हें देश के प्रति प्रेम के साथ - साथ शत्रु से घृणा करना भी सिखाना होगा।

इसलिए मैं खून माँगता हूँ। शत्रु का खून ही उसके अपराधों का बदला चुका सकता है। किन्तु हम खून तब ही ले सकते हैं जब खून देने के लिए तैयार हों। इस युद्ध में बहने वाला हमारे वीरों का खून ही हमारे किए पापों को धो डालेगा। हमारा आगामी कार्यक्रम खून देने का है। हमारी आजादी की कीमत हमारे वीरों के खून की कीमत है। हमारे वीरों के खून, उनकी बहादुरी और पराक्रम ही भारत की जनता द्वारा ब्रिटिश आतताइयों और जुल्मियों से बदला लेने की माँग पूरा करना सुनिश्चित करेंगे।

वृद्ध बहादुरशाह ने पराजय के बाद इसी पैगम्बरी अन्तर्दृष्टि के साथ कहा था :

" गाजियों में भी रहेगी, जब तलक ईमान की,
तख़्ते लन्दन तक चलेगी, तेग हिन्दुस्तान की। "

जय हिन्द

Posted by collective at June 02, 2007 12:31 PM
Comments

kindly send the last part again as it cannot be deciphered

Posted by: DR. SAMAN Y. KHAN on July 4, 2007 07:10 AM
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